Thursday, September 2, 2010

सौदा नहीं पटा तो अभियान


15 सितंबर 2010 को टाइम्स ऑफ इंडिया ‘कॉमनवेल्थ गेम्स’ को लेकर कौन-सी खबर छापेगा? यह अभी से कहना नामुमकिन है। लेकिन, हम आपसे यह कहें कि अगर नौ महीने पहले ‘कॉमनवेल्थ आयोजन समिति’ के साथ ‘टाइम्स ग्रुप’ की डील हो गई होती तो 15 सितंबर को टाइम्स ग्रुप का समाचार पत्र, न्यूज और एफएम चैनल विशेष तौर पर बताता कि दिल्ली और दिल्ली वाले किस तरह कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए पूरी तरह तैयार हैं। यह बताता कि वे न सिर्फ तैयार हैं, बल्कि दुनिया के सामने पहली बार सबसे बेहतरीन आयोजन को अंजाम देने जा रहे हैं। 15 सितंबर को टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, महाराष्ट्र टाइम्स, मुंबई मिरर, सांध्य टाइम्स दो से आठ पन्नों का विशेष परिशिष्ट छापते। इसके साथ इकनॉमिक्स टाइम्स में भी खास कवरेज रहता। दूसरी ओर टाइम्स ग्रुप के दोनों न्यूज चैनल कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन समिति के चेयरमैन सुरेश कलमाडी पर खास कार्यक्रम कर खेलों को सफल बनाने में जुटे हर वालंटियर का उत्साह दोगुना करने में जुटा होता।
अगस्त के पहले दो हफ्तों में जब ‘टाइम्स ग्रुप’ के अखबार और ‘न्यूज चैनल’ क्विंस बैटन के दौरान हुए घपलों की पोल पट्टी खोल रहे थे और सुरेश कलमाडी की फजीहत विदेश मंत्रालय से लेकर संसद के भीतर तक हो रही थी...। अगर ‘टाइम्स ग्रुप’ की नौ महीने पहले कॉमनवेल्थ के आयोजन समिति के साथ डील हो गई होती तो इन सारी खबरों के बदले कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर सुरेश कलमाडी की तैयारी की वाहवाही यही ‘टाइम्स ग्रुप’ कर रहा होता। 14 अगस्त को जब कॉमनवेल्थ गेम्स में 50 दिन बचे थे और जिस दिन कॉमनवेल्थ की रुकी घड़ी अखबार से लेकर ‘न्यूज चैनल’ के पर्दे पर बार-बार दिखाई जा रही थी और दिल्ली को कॉमनवेल्थ के लिए सबसे नाकाबिल शहर बताया जा रहा था, अगर नौ महीने पहले वाली डील पक्की हो गई होती तो 14 अगस्त को ‘टाइम्स ग्रुप’ इसी कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर देश-दुनिया का उत्साह दोगुना करने के लिए इसमें शामिल होने वाले एथलिट्स को लेकर परिशिष्ट भी निकालता। साथ ही चैनल में कार्यक्रम भी करता। डील हो गई होती तो दुनिया के टॉप मोस्ट एथलिटों के इंटरव्यू और उनपर केन्द्रित कार्यक्रम दिखाने और छापने का भी आइडिया था, जो कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल होने दिल्ली पहुंचने वाले हैं। यानी बीते डेढ़ महीने में कॉमनवेल्थ को लेकर जो भी खबर टाइम्स ग्रुप में आपने देखी या पढ़ी अगर कॉमनवेल्थ गेम्स का सहयोगी मीडिया पार्टनर ‘टाइम्स ग्रुप’ हो गया होता, तो यह सब देखने-सुनने को नहीं मिलता।
लेकिन मीडिया का मतलब तो ‘टाइम्स ग्रुप’ है नहीं। वह सबसे बड़ा ग्रुप है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। फिर भी यह कैसे कहा जा सकता है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के तमाम घपलों पर डील की कारपेट पड़ गई होती, अगर टाइम्स ग्रुप से डील हो गई होती। जाहिर है ऐसा होता नहीं। या कहें यह सोचना मुश्किल है। लेकिन मीडिया का चेहरा अपने आप में डील के लिए कैसे एक है और डील किस तरह ‘पेड न्यूज’ के आगे की सोच है...। असल कहानी यही है। ठीक दस महीने पहले, कह सकते हैं कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के करीब एक साल पहले कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति ने तमाम मीडिया हाउसों को यह कहकर आमंत्रित किया था कि कॉमनवेल्थ गेम्स को सफल बनाना है। इसमें मीडिया की भागीदारी बेहद जरूरी है। जाहिर है कॉमनवेल्थ गेम्स का मतलब अरबों का बजट है तो इसके प्रचार-प्रसार में भी करोड़ों का खर्चा होना ही था। तमाम मीडिया हाउसों में पहली तरंग इसी बात को लेकर उठी कि प्रचार का बजट अगर उनके हिस्से आए तो बात ही क्या है। इसका असर पहली बैठक में नजर आया, जिसमें मीडिया संपादकों से ज्यादा मीडिया हाउसांे के लिए विज्ञापन जुगाड़ने वाले या फिर उन डायरेक्टरांे की फौज दिखाई पड़ी जो हर हाल में कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए अपने-अपने मीडिया हाउसों को सुरेश कलमाडी यानी आयोजन समिति का पार्टनर बनने को बेचैन थे। जाहिर है मीडिया पार्टनर बनने का मतलब एकमुश्त करोड़ों की डील और उसके जरिए कॉमनवेल्थ से जुड़ने वाले प्रोडक्टों से कमाई। इस कमाई के लिए ही हर राष्ट्रीय अखबार और न्यूज चैनलों ने अपने-अपने टेंडर डाले। लेकिन सुरेश कलमाडी प्रचार के इस सच को समझते हैं कि अंग्रेजी मीडिया से उनका काम चल सकता है, क्योंकि देश में पॉलिसी मेकर अंग्रेजी मीडिया को ही देखता है। इसलिए टेंडर आने के बाद सुरेश कलमाडी ने आयोजन समिति के एडीजी कम्युनिकेशन को जो पहला निर्देश दिया। हिन्दी मीडिया को खारिज कर अंग्रेजी मीडिया के टेंडरों को देखने का काम हो। लेकिन सुरेश कलमाडी ने यहां भी यूज-एंड-थ्रो की पॉलिसी अपनाई।
हालांकि जानकारी के मुताबिक, आयोजन समिति में प्रचार-प्रसार देखने वाले कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट में इस बात को लेकर भी चर्चा हुई कि एक को पार्टनर बना कर दूसरे को खारिज करना कहां तक सही होगा। वह भी तब जब मीडिया अपने आप में गला काट खेल टीआरपी से लेकर विज्ञापन पाने तक के लिए कर रही है। पर सुरेश कलमाडी का कहना था, ‘लेकिन टेंडर सभी को नहीं दिया जाता।’ कलमाडी की इस थ्योरी के तहत चर्चा जो भी हुई हो, लेकिन अखबार के मीडिया हाउसों में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को खारिज कर ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ को चुना गया। अंग्रेजी न्यूज चैनलों में एनडीटीवी को खारिज कर ‘सीएनएन-आईबीएन’ को चुना गया। प्रचार-प्रसार के लिए करोड़ों की इस डील में टाइम्स ऑफ इंडिया का 12 करोड़ 19 लाख रुपए का टेंडर खारिज हो गया। हिन्दुस्तान टाइम्स का करीब पौने दस करोड़ का टेंडर मंजूर हो गया। इसी तर्ज पर एनडीटीवी और सीएनएन-आईबीएन का भी खेल हुआ।
यहां सवाल उठाया जा सकता है कि जिन्हें सुरेश कलमाडी ने खारिज किया वह कॉमनवेल्थ गेम्स के पीछे पड़ गए। वे हर घपले को खोद-खोदकर निकालते चले गए। लेकिन घपलों में डूबी कॉमनवेल्थ लूट जब सामने आई उन मीडिया हाउसों की भी मजबूरी बन गई कि वह अपनी संपादकीय छवि के साथ कैसे समझौता करें। इसलिए जो तेवर और तल्खी ‘टाइम्स ग्रुप’ ने दिखाई वह हिन्दुस्तान ने नहीं दिखाई। हिन्दुस्तान टाइम्स ने सिर्फ सूचना के तौर पर कॉमनवेल्थ गेम्स के घपलों को पकड़ा। कुछ यही स्थिति एनडीटीवी और सीएनएन-आईबीएन की रही। एनडीटीवी की रिपोर्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के घपलों को सूंड से पकड़ रही थी, तो सीएनएन-आईबीएन ने घपलों को पूंछ से पकड़ा। लेकिन ‘टाइम्स ग्रुप’ के पास चूंकि न्यूज चैनल भी हैं और उसने ‘हर दिन हर घंटे’ जब अपने समूह की खबरों के इनपुट पर सुरेश कलमाडी को घेरना शुरू किया तो उसके सामने कोई टिका नहीं। यहां तक की टाइम्स की रिपोर्ट पर जदयू के सांसद शरद यादव ने लोकसभा में सुरेश कलमाडी को मोटी चमड़ी वाला तक कह दिया। और टाइम्स ग्रुप के उन डायरेक्टरों के लिए भी यह गर्व की बात हुई कि संपादकीय सोच और रिपोर्टरों की रिपोर्ट ने उस कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति या उसके चेयरमैन सुरेश कलमाडी को पूरी तरह नंगा कर दिया, जिसने उनके टेंडर को खारिज कर दिया था। यानी संपादकीय समझ अगर तेवर वाली और सच को उजागर करने वाली हो तो फिर विज्ञापन मांगने वालों की मूंछ कोई नीचे नहीं कर सकता।
लेकिन मीडिया के भीतर विज्ञापन के नाम पर कैसे संपादकीय सोच को गिरवी रखा जाता है, यह भी संयोग से ‘टाइम्स ग्रुप’ के उस टेंडर से ही उभरता है, जिसमें 12 करोड़ 19 लाख रुपए के बदले करीब 28 पेज विज्ञापन के और बिना विज्ञापन 16 पेज खबरों को देने की बात कही गई। अगर टाइम्स ग्रुप के साथ कॉमनवेल्थ की डील हो गई होती तो 26 जनवरी 2010 से यानी कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू होने के 250 दिन पहले से प्रचार-प्रसार शुरू होता। इसमें खासतौर से पांच पड़ाव ऐसे रखे गए थे जिस दिन टाइम्स ग्रुप कॉमनवेल्थ के लिए समूचे देश में धूम मचा देता। शुरुआत 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस से होती। फिर 8 मार्च यानी कॉमनवेल्थ दिवस, 25 जून यानी क्विन्स बैटन के भारत की सीमा में प्रवेश का दिन, फिर 14 अगस्त यानी कॉमनवेल्थ से ठीक 50 दिन पहले का जश्न और पांचवा 15 सितंबर यानी सिर्फ 18 दिन पहले कॉमनवेल्थ के लिए तैयार दिल्ली। इन दिनों ‘टाइम्स ग्रुप’ अपने सभी अखबारो में खबरो के पन्नों पर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए बिना विज्ञापन के दस पेज में ऐसी-ऐसी रिपोर्ट छापता, जिससे कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर ऐसी विश्वसनीयता देश में पैदा होती कि इससे सफल आयोजन और कुछ हो ही नहीं सकता है। लेकिन खबरांे के पन्नों का बिकना यहीं नहीं रुकता, बल्कि टाइम्स ग्रुप छह पन्नें की रिपोर्ट उन 15 से ज्यादा स्टेडियम की तैयारी पर छापता। वह यह कि किस तरह शानदार आयोजन के लिए शानदार स्टेडियम तैयार हैं। यानी अभी जो स्टेडियम की बदहाली की खबरें छप रही हैं और जिस तरह हर स्टेडियम में सीपीडब्ल्यूडी, एनडीएमसी, डीडीए, एमसीडी समेत तमाम संस्थान के घपले की परतंे छिपी हैं। उनके बदले इन स्टेडियम को पूरा करने में लगे हुनर और इसमें इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्पाद का जिक्र होता। फिर स्टेडियम जब आयोजन समिति को सौंपा जाता तो स्टेडियम सौंपने के शानदार किस्से बतौर रिपोर्ट अखबारो के पन्नोें पर छपते। यानी यह नहीं रहता कि जिस जवाहरलाल स्टेडियम के पुनर्सुंदरीकरण में साढ़े छह सौ करोड़ लग गए, उस रकम में तीन नए स्टेडियम बन जाते। और प्रत्येक स्टेडियम में बैठने से लेकर पार्किंग तक और सुविधाओं की भरमार स्टेडियम के हर कोने की तस्वीरें छपती। उसकी जानकारी दी जाती।
खास बात यह भी है कि संपादकीय समझ या खबरों का पन्ना विज्ञापन के लिए दांव पर लगाने से समाचार पत्र की छवि घूमिल होती है। इस सोच से इतर विज्ञापन के लिए दिए गए टेंडर में बकायदा यह लिख कर संकेत दिया गया कि विज्ञापन पार्टनर बनाने का मतलब हमारा संपादकीय विभाग भी आपके वाह-वाह में जुट जाएगा। ऐसा नहीं है कि यह समझ सिर्फ टाइम्स ग्रुप की है, बल्कि ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने भी कॉमनवेल्थ गेम्स में मीडिया पार्टनर बनने के लिए खबरांे में कॉमनवेल्थ के वाह-वाह करने के संकेत दिए। संपादक को कितना अपाहिज एक झटके में बना दिया गया, यह इससे भी समझा जा सकता है कि घपलांे या घोटालांे के उभरने से पहले नवंबर 2009 यानी नौ महीने पहले ही कॉमनवेल्थ आयोजन समिति को बाकायदा लिखकर यह भरोसा दिला गया कि कॉमनवेल्थ खेल को लेकर सकारात्मक और सही भूमिका संपादकीय विभाग भी अपनाएगा। साथ ही सभी आम जनता की सोच को भी कॉमनवेल्थ गेम्स से जोड़ने में लगेंगे। कह सकते हैं कि अभी जिस तरह टाइम्स ग्रुप ने समूचे देश को कॉमनवेल्थ लूट से परिचित कराते हुए, कांग्रेस तक को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि सुरेश कलमाडी बतौर कांग्रेसी कॉमनवेल्थ नहीं संभाल रहे हैं। सोनिया गांधी को कहना पड़ा कि 15 अक्टूबर के बाद यानी कॉमनवेल्थ गेम्स समाप्त होने के बाद किसी भी घोटालेबाज को बख्शा नहीं जाएगा। फिर पीएमओ की तरफ से बयान आया कि अब सबकुछ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की निगरानी में होगा। अगर यह सारी खबरें संपादकीय विभाग की मेहनत से नहीं आती और टाइम्स के साथ नवंबर 2009 में ही डील हो गई होती तो 10 नवबंर 2009 को सुरेश कलमाडी के नाम ‘टाइम्स आफ इंडिया’ के डायरेक्टर सी.आर. श्रीनिवासन का पहला पत्र देखना जरूरी होगा। इसमें उन्होने ‘टाइम्स ग्रुप’ को कॉमनवेल्थ आयोजन समिति से मीडिया पार्टनर बनाने की गुहार लगाते हुए अपने स्तर पर बिना कॉमनवेल्थ बजट के लंबी चौड़ी फेरहिस्त के आयोजन की जिम्मेदारी लेते हुए लिखा कि इससे कॉमनवेल्थ गेम्स को लेकर समूचे देश में चार-चांद लग जाएंगे। मसलन डील हो गई होती तो टाइम्स ग्रुप देश भर में पहले से ही कॉमनवेल्थ क्विज से लेकर सेमिनार तक आयोजित करता। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के वक्ता शिरकत करते। देश के हर बड़े और प्रमुख शहर में ‘दिल्ली चलो’ के नाम से मैराथन होता। काफी टेबल बुक भी निकलती। देश का ऐसा कोई इलाका न छुटता, जहां टाइम्स ग्रुप के पांच अखबारांे की पहुंच नहीं है। इस प्रकार वहां कॉमनवेल्थ पहले ही पहुंच जाता।
अब सवाल है कि क्या सुरेश कलमाडी को ‘टाइम्स ग्रुप’ के साथ समझौता न करना महंगा पड़ा। या फिर अगर वह टाइम्स ग्रुप के साथ समझौता करते तो कोई दूसरा ग्रुप जिसके साथ समझौता न करते वह उनके पीछे पील पड़ता। ऐसे में यदि कलमाडी ही समझदार होते तो शुरू से ही हर मीडिया हाउस को मैनेज करते चलते, जिससे कॉमनवेल्थ लूट की पोटली कम से कम इस रूप में तो नहीं खुलती। हो कुछ भी सकता है। लेकिन इस खेल ने पहली बार यह खुला खेल जरूर सामने ला दिया कि ‘पेड न्यूज’ या उसके आगे का विस्तार अगर खबरों को ही मुनाफे के लिए विज्ञापन डील के जरिए खत्म करना है तो फिर विश्वसनीयता के साथ किसी मीडिया समूह के होने का मतलब महज विज्ञापन नहीं है, बल्कि इसके लिए संपादक और रिपोर्टर चाहिए। क्योंकि यह न होता तो कॉमनवेल्थ लूट का खेल बाहर भी न आ पाता। साथ ही टाइम्स की छवि भी बची न रहती और चौथा खम्भा भी उस लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर पाता, जो लोकतंत्र वाकई खतरे में है।
(खबरों के इस गोरखधन्धे पर आप पत्रिका के संपादक की टिप्पणी यहां पढ़ सकते हैं।) (पूरी खबर "प्रथम प्रवक्ता" के १६ सितम्बर के अंक में पढ़ सकते है.)

Saturday, May 29, 2010

सच छुपाने की कोशिश

नीरा राडिया के संचार मंत्री ए. राजा से संबंधों की जांच के दस्तावेजों से एक बड़ा खुलासा मीडिया के कई नामचीन लोगों के बारे में हुआ है। खबरें बनाने वाली मीडिया का अपराध ए. राजा और नीरा राडिया के कारनामों के नीचे कहीं दबता जा रहा है। या यंू कहें की उसे दबाया जा रहा है। स्पेक्ट्रम विवाद में मीडिया के कुछ खास लोग चर्चा में हैं-एनडीटीवी की ग्रुप एडीटर बरखा दत्त, हिंदुस्तान टाइम्स के संपादकीय डायरेक्टर वीर सांघवी, नईदुनिया के मालिक अभय छजलानी, चैनल न्यूज एक्स और इसके प्रमुख जहांगीर पोचा। दस्तावेजों में इस बात का जिक्र है कि वीर सांघवी और बरखा दत्त नीरा राडिया के कहने पर ही ए. राजा को मंत्री बनाए जाने के लिए पैरोकारी कर रहे थे। गत 28 अप्रैल को पायनियर अखबार ने स्पेक्ट्रम घोटाले की खबर छापी थी। इसके एक दिन बाद मुंबई की अखबार ‘मिड डे’ और ‘द हिंदू’ ने अपने वेबसाइट पर भी यह खबर छापी। मिड डे ने भी इन पत्रकारों के नामों का खुलासा नहीं किया। ‘द हिंदू’ ने सभी दस्तावेज वेबसाइट पर डाल दिए, लेकिन शाम होते-होते अखबार के संपादक की तरफ से एक नोटिस जारी किया गया कि इन दस्तावेज की प्रमाणिकता नहीं है। लिहाजा हम इस रिपोर्ट को वापस लेते हैं। ‘द हिंदू’ के प्रधान संपादक एन. राम क्या अपने पाठकों को यह बताएंगे कि उस दस्तावेज की प्रमाणिकता की जरूरत उन्हें इतनी देर से क्यों महसूस हुई? जबकि ये दस्तावेज देखकर ही उन्होंने खबर की मंजूरी दी होगी। जयललिता ने भी इन दस्तावेजों को पत्रकारों में बंटवाया। यह जानना जरूरी है कि ‘एनडीटीवी’ के मालिक प्रणय राय और ‘द हिंदू’ साथ मिलकर चेन्नई में स्थानीय टीवी चैनल चलाते हैं। लिहाजा ‘द हिंदू’ बरखा दत्त और वीर सांघवी का नाम छापने से बचना चाहता था।‘टीवी टुडे’ समूह का अंग्रेजी चैनल ‘हेडलाइनस टुडे’ ने नीरा राडिया और ए. राजा के बातचीत का एक छोटा-सा हिस्सा दिखाया। हालांकि इस चैनल के हरेंद्र बवेजा और आशीष खेतान का दावा है कि उनके पास बातचीत की पूरी टेप मौजूद है, लेकिन जो दर्शकों को दिखाया जा रहा है, वह नीरा राडिया और ए. राजा के बातचीत का एक छोटा-सा हिस्सा है। इन खोजी पत्रकारों से एक सीधा सवाल यह है कि क्या इस घोटाले में अनिल अंबानी और सुनील भारती मित्तल शामिल नहीं हैं? वैसे दस्तावेजों में नीरा राडिया के जहांगीर पोचा और अभय छजलानी से संबंधों का भी जिक्र आया है। एक जगह यह भी लिखा हुआ है कि नीरा राडिया की कंपनी से चैनल और अखबार के पत्रकारों को बहुत सारी सुविधाएं दी जाती रही है। सीबीआई इसकी जांच कर रही है कि वे पत्रकार कौन हैं?

Saturday, November 29, 2008

आज की पत्रकारिता सर्कस की तरह है .

आज की पत्रकारिता सर्कस की तरह है.
वर्तिका नंदा
आज हम पत्रकारिता के जिस दौर से गुजर रहे हैं, वह सर्कस की तरह है. जहां न्यूज में न्यूज कम है और ब्यूज अधिक है. आज पत्रकारिता में सारा खेल टीआरपी और पैसा का है. खासकर न्यूज चैनल टीआरपी के अंधी दौड़ में इतना पागल हो जाते हैं कि उन्हें उचित-अनुचित का खयाल ही नहीं रहता. सबसे जल्दी न्यूज देने के चक्कर में कई बार चैनल गलत न्यूज भी दे देते हैं. इतना ही नहीं वे अपने चैनल पर दर्शकों को इकट्ठा करने के लिए कोई भी हथकंडा अपनाने से नहीं बाज आते. चाहे इसके चलते कोई व्यक्ति आत्महत्या भी कर ले. उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. इसका कारण यह है कि लोग पहले पत्रकारिता में पैशन के चलते आते थे. बाद में यह प्रोफेशन हो गया और अब पत्रकारिता सेनसेशन हो गया है. पहले जहां पत्रकारिता का उद्येश्य समाज का बदलना और उसमें अच्छे संदेशों का संचार करना था, वहीं आज पत्रकारिता के द्वारा समाज में सेनसेशन फैलाने की कोशिश की जाती है. वे यह नहीं सोचते कि इस समाचार को दिखाने से समाज में दंगा भड़क सकता है या सामाजिक विद्वेष फैल सकता है. इसे दूसरे शब्दों में कहें तो आज के न्यूज चैनलों ने दिमाग से काम करना छोड़ दिया है. कारण चाहे जो भी हो लेकिन उन्होंने जिस तरह से खबरों की बमबार्डिंग शुरू की है, उससे आम जनता के अंदर वितृष्णा पैदा हो रही है. वह दिन दूर नहीं जब लोग इन न्यूज चैनलों से किनारा कर लेंगे.
पहले के पत्रकारों में पत्रकारिता का इतना जुनून हुआ करता था कि पत्रकार लोगों के घर-घर जाकर समाचार सुनाया करते थे. आज किसी भी पत्रकार में यह भाव नहीं है. आज पत्रकारिता में लोग समाज कल्याण की भावना से नहीं आते बल्कि ग्लैमर और पैसा के कारण आते हैं. आज जिस तरह से नये-नये लोग इस क्षेत्र में आ रहे हैं, उन सबको ऐसा लगता है कि टीवी पर उन्हें जल्दी पहचान मिलेगी. अगर इन लोगों को यह कह दिया जाए कि टीवी में काम करने से पहले आप एक साल तक अखबार में काम करके आएं तो टीवी में इन युवाओं की जमघट कम हो जायेगी. क्योंकि असली पत्रकारिता अखबार की ही होती है. अखबार में पत्रकार को मेहनत करनी होती है. और आज के युवा मेहनत करने से भागते हैं. इलेक्ट्रानिक में तो पत्रकार एक-दो लोगाें की बाइट ले लिया और दो-चार विजुअल्स ले लिए, बस हो गयी पत्रकारिता. मेरे विचार से पत्रकारिता अगर थोड़ी-बहुत बची हुई है, तो वह अखबार के ही माध्यम से. प्रिंट माध्यम की पत्रकारिता हमेशा अध्ययन, तैयारी और गहराई की मांग करती है. इसमें उनको मेहनत करनी होती है, लेकिन आज के पत्रकार मेहनत करने से बचते हैं. कई बार हमें तब ज्यादा दुख होता है, जब प्रिंट के पत्रकार भी बिना कोई तैयारी के इंटरव्यू के लिए चले आते हैं.
हम सभी जानते हैं कि विकास के साथ-साथ किसी भी चीज में परिपक्वता और समझदारी आती है. लेकिन पत्रकारिता के साथ उल्टा ही हो रहा है. पत्रकारिता अपने विकास के साथ-साथ सोचना-समझना छोड़ दिया है. पत्रकारिता पर सबसे अहम जिम्मेदारी समाज निर्माण की होती है. इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कहा जाता है. लेकिन जिस तरह से यह आजकल हरकत कर रहा है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह अपनी भूमिका और जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा. अनुशासन पत्रकारिता के लिए उतना ही जरूरी है, जितना किसी भी व्यक्ति के लिए. पत्रकारिता जब तक अनुशासित नहीं होगी, तब तक वह अपनी जिम्मेदारी और उद्देश्यों के प्रति न्याय नहीं कर सकेगी. इसलिए मीडिया की यह जिम्मेदारी बनती है कि बिना किसी पुख्ता सबूत के संवेदनशील मामलों को मीडिया में ज्यादा हाइप देने से बचें. सरकार को भी ऐसे मामलों में मीडिया पर कड़ा रूख अपनाना चाहिए. अगर कोई पत्रकार जान बूझकर गलत रिपोर्टिंग करता है तो उस पर डंडा अवश्य पड़ना चाहिए. बातचीत- संजीव कुमार

Wednesday, August 13, 2008

गुरूजी ने कहा

उदय प्रकाश की कहानी मैंगोशेकऐसा माना जाता है कि Çहदी के उत्तर आधुनिक रचनाकार उदय प्रकाश हैंण् उत्तर आधुनिक विचारों के केंद्र में बाजार निहित हैण् उन्होंने एक कहानी लिखी है- मैंगोशेकण् उस कहानी में तमाम उत्तर आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हैण् उन तकनीकों के इस्तेमाल से यथार्थ के ब्योरे बहुत ही तीखे और सघन रूप में उरे हैंण्ये तकनीकें यथार्थ को जिस गहराई से उारती है, वह उत्तरआधुनिकता की ही देन हैण् उदय प्रकाश जानते हैं कि हम इस बाजार केंिद्रत ज्ञान से क्या ले सकते हैंण् इस कहानी में बाजार केंिद्रत विचार व्यवस्था पर बड़ा कड़ा प्रहार किया गया हैण् यहां मैं उसके अंतिम अंश का उल्लेख कर रहा हूं- लेकिन सबसे अधिक चौंकाने वाला दस्तावेज पेंटागन का हैण् इथोपिया, घाना, ारत, बांगलादेश, इराक, अफगानिस्तान, बोिज्मया, फिलिस्तीन, श्रीलंका, नामीबिया, ब्राजील समेत 67 देशों में ऐसे बच्चे लगातार जन्म ले रहे हैंण् जिनका सिर तेजी से बड़ा हो रहा है और जिनका दिमाग सबकुछ जानता हैण् वे बच्चों की तरह अबोध और मासूम नहÈ हैंण् इन बच्चों के सिर के ीतर स्थित मस्तिष्क की उम्र उनकी स्वााविक उम्र से कई गुणा ज्यादा बड़ी हैण् लेकिन उसके मस्तिष्क में कई शतािब्दयों की जैविक स्मृतियां मौजूद हैंण् उनके डीएनए अजीब तरीके से एक जैसा हैण् पेंटागन के मुताबिक इस समय की सी देशों की सी सरकारों को इन बड़े सिर वाले बच्चों पर निगाह रखनी होगीण् उनकी आइडेंटीटी यह है- वे गरीब घरों में गंदगी और कुपोषण के बीच पैदा हुए हैंण् उनकी आंखें चÈटियों की तरह लाल है और उन्हें नÈद लगग नहÈ आतÈण्हम आज उदारीकरण और ूमंडलीकरण के पक्षधर हैंण् अपनी सरकार और दुनिया के सरकारों को ी देख रहे हैंण् यह कहानी इतिहास के अंत का नहÈ बल्कि इतिहास में आदमी की नयी ूमिका की तलाश है, जो दिल्ली की मलिन बस्ती जहांगीर पुरी में शुरू होती है और पूरे वैिश्वक स्तर पर प्रतिरोध के स्वर में फैल जाती हैण् ऐसी साहिित्यक रचनाओं की उपलब्धि बहुत बड़ी है और वह स्वाधीनता के लिए लड़ाई के एक नये मोर्चे की तलाश है, जो प्रु शक्तियों के विरुद्ध हैण्(जैसा गुरु जी ने मुझसे कहा)

Friday, June 20, 2008

पैसा बोले आपकी भाषा

इकनॉमिक टाईम्स का विज्ञापन है - पैसा बोले आपकी भाषा ! लेकिन आम आदमी के पास तो पैसा ही नहीं है । वह कौन सी भाषा बोलेगा और सुनेगा ।

Thursday, June 12, 2008

आरुषि

क्या हो गया है मीडिया को । दिल्ली मे रोज दो - चार कत्ल होते हैं , लेकिन उन घटनायों का सिर्फ़ जिक्र कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। लेकिन आरुषि हत्याकांड मे यह कुछ ज्यादा ही रूचि ले रहा है। इसका कारण स्पष्ट है कि उसे इस घटना के रिपोर्टिंग मे कुछ ज्यादा ही मजा आ रहा है। क्योंकि इसमे उसे अन्य घटना की तुलना मे कुछ ज्यादा मिर्च - मशाला लगाने को मिल रहा है। यह सही है कि टीआरपी की होड़ में शामिल होने के लिए सभी चैनलो के द्वारा कुछ भी किया जा रहा है। लेकिन चैनल इस दौरान समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूल रहे हैं। यह मीडिया के लिए उचित नही.

Thursday, February 21, 2008

वाह मीडिया

आज मीडिया अपने संक्रमण के दौर से गुजर रहा है- उस पर बाज़ार पूरी तरह हावी है- मीडिया चैनलों का खबर आज बाज़ार निर्धारित कर रहा है- क्योंकि पूरे मीडिया का कंटेंट विज्ञापन एजेंसियां तय करने लगी है- यह सभी जानते हें कि विज्ञापन एजेंसियां और अद्द्योगिक घरानों मे नाभिनाल संबंध है- यही कारण है कि उनके लिए खबरों की तुलना मे विज्ञापन महत्वपूर्ण हो गया है- यहाँ तक कि कई बार अच्छी और गंभीर खबर को यह कह कर दबा दिया जाता है कि अमिताभ बच्चन को ठंड लग गयी है- और यह सबसे अच्छी खबर है- वाह मीडिया ! तेरा जवाब नहीं-